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तुम्हें याद हो कि न याद हो!
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो, वही या’नी वा’दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन खाँ मोमिन
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मुहब्बत का घर!
आज मैं अपने समय में हिन्दी के श्रेष्ठ कवि, संपादक और गीतकार रहे तथा काव्य-मंचों की शोभा बढ़ाने वाले स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की दो ग़ज़लें शेयर कर रहा हूँ| नंदन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की यह दो ग़ज़लें– तेरा जहान…
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इक दुनिया नई पैदा करें!
इस पुरानी बेवफ़ा दुनिया का रोना कब तलक, आइए मिल-जुल के इक दुनिया नई पैदा करें| नज़ीर बनारसी
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आप कोई दूसरा धंदा करें!
कीजिएगा रहज़नी कब तक ब-नाम-ए-रहबरी, अब से बेहतर आप कोई दूसरा धंदा करें| नज़ीर बनारसी
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बंद अपने घर का दरवाज़ा करें!
सुन रहा हूँ कुछ लुटेरे आ गए हैं शहर में, आप जल्दी बंद अपने घर का दरवाज़ा करें| नज़ीर बनारसी
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दें पर्दे से पर्दे का जवाब!
जी में आता है कि दें पर्दे से पर्दे का जवाब, हम से वो पर्दा करें दुनिया से हम पर्दा करें| नज़ीर बनारसी
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दो दिन में हम क्या क्या करें!
ये करें और वो करें ऐसा करें वैसा करें, ज़िंदगी दो दिन की है दो दिन में हम क्या क्या करें| नज़ीर बनारसी
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न समझ सकें तो पानी!
मिरी बे-ज़बान आँखों से गिरे हैं चंद क़तरे, वो समझ सकें तो आँसू न समझ सकें तो पानी| नज़ीर बनारसी
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कि सँवर गई जवानी!
तिरा हुस्न सो रहा था मिरी छेड़ ने जगाया, वो निगाह मैंने डाली कि सँवर गई जवानी| नज़ीर बनारसी