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न समझ सकें तो पानी!
मिरी बे-ज़बान आँखों से गिरे हैं चंद क़तरे, वो समझ सकें तो आँसू न समझ सकें तो पानी| नज़ीर बनारसी
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कि सँवर गई जवानी!
तिरा हुस्न सो रहा था मिरी छेड़ ने जगाया, वो निगाह मैंने डाली कि सँवर गई जवानी| नज़ीर बनारसी
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कि बरस चुका है पानी!
मिरा ग़म रुला चुका है तुझे बिखरी ज़ुल्फ़ वाले, ये घटा बता रही है कि बरस चुका है पानी| नज़ीर बनारसी
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तो ये कैसी बद-गुमानी!
नहीं मुझसे जब तअल्लुक़ तो ख़फ़ा ख़फ़ा से क्यूँ हैं, नहीं जब मिरी मोहब्बत तो ये कैसी बद-गुमानी| नज़ीर बनारसी
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ये बला की मेहरबानी!
ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी, मेरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़बानी| नज़ीर बनारसी
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प्रिये तुम्हारी इन आँखों में!
आज मैं अपने समय में हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार रहे तथा काव्य-मंचों की शोभा बढ़ाने वाले स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का यह गीत– प्रिये तुम्हारी…
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नासमझ हवा पूछ रही है इक पता!
शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता, मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी| परवीन शाकिर
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रूह के और जाल भी!
उसके ही बाज़ुओं में और उसको ही सोचते रहे, जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी| परवीन शाकिर
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छुप गया अपने ग़मों का हाल भी!
उसकी सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं, उसकी हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी| परवीन शाकिर