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किसी शख़्स के हाथ आए हैं!
याद जिस चीज़ को कहते हैं वो परछाईं है, और साए भी किसी शख़्स के हाथ आए हैं| राही मासूम रज़ा
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ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को!
ज़िंदगी ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को, उसके गेसू तो मिरे प्यार ने सुलझाए हैं| राही मासूम रज़ा
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ऐ अज़्म-ए-सफ़र हमको सँभाल!
हम थके-हारे हैं ऐ अज़्म-ए-सफ़र हमको सँभाल, कहीं साया जो नज़र आया है घबराए हैं| राही मासूम रज़ा
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ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाए हैं!
प्यास बुनियाद है जीने की बुझा लें कैसे, हमने ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाए हैं| राही मासूम रज़ा
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यही एक ख़बर लाए हैं!
लोग यक-रंगी-ए-वहशत से भी उकताए हैं, हम बयाबाँ से यही एक ख़बर लाए हैं| राही मासूम रज़ा
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सुरसा सा मुंह फाड़ रही है!
आज मैं मेरे लिए गुरु-तुल्य रहे हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी की एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत– गलियों मेंचौराहों परघर-घर में मचे तुफ़ैल-सी।बाल बिखेरे…
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मैं वही हूँ ‘मोमिन’-ए-मुब्तला!
जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा, मैं वही हूँ ‘मोमिन’-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन खाँ मोमिन
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सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या!
सुनो ज़िक्र है कई साल का कि किया इक आप ने वा’दा था, सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन खाँ मोमिन
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कभी हम भी तुम भी थे आश्ना!
कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी, कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन खाँ मोमिन