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हमने ख़ुद-कुशी कर ली!
वो जिनको प्यार है चाँदी से इश्क़ सोने से, वही कहेंगे कभी हमने ख़ुद-कुशी कर ली| कैफ़ी आज़मी
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नज़र मिली भी न थी और !
नज़र मिली भी न थी और उन को देख लिया, ज़बाँ खुली भी न थी और बात भी कर ली| कैफ़ी आज़मी
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काँटों से दोस्ती कर ली!
मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली, इसी तरह से बसर हम ने ज़िंदगी कर ली| कैफ़ी आज़मी
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विदागीत!
आज मैं आधुनिक हिन्दी कविता के श्रेष्ठ कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता– भागते हैं,छूटते ही जा रहे हैं पेड़पीपल-बेर-बरगद-आम के,बिछुड़ती पग-लोटती घासें,खिसकती ही जा रही हैंरेत…
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जंगल काफ़ी है वहशत के लिए!
बे-हिस दीवारों का जंगल काफ़ी है वहशत के लिए, अब क्यूँ हम सहरा को जाएँ अब वैसे हालात कहाँ| राही मासूम रज़ा
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देखी थी कोई बरसात कहाँ!
मेरी आबला-पाई* उनमें याद अक्सर की जाती है, काँटों ने इक मुद्दत से देखी थी कोई बरसात कहाँ|*पैर के छाले राही मासूम रज़ा
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फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ!
ऐ आवारा यादो फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ, हमने तो सहरा में बसर की तुमने गुज़ारी रात कहाँ| राही मासूम रज़ा
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दीवाने हैं सहरा से चले आए हैं!
इस बयाबान-ए-दर-ओ-बाम में क्या रक्खा है, हम ही दीवाने हैं सहरा से चले आए हैं| राही मासूम रज़ा
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जो अक्सर हमें याद आए हैं!
हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें, हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं| राही मासूम रज़ा