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तितली को गिरा कर देखो!
गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो, आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा| कैफ़ भोपाली
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लिक्खा था अंधेरा शायद!
दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद, वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा| कैफ़ भोपाली
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यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल!
इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल, तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा| कैफ़ भोपाली
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पड़ोसी के घर आया होगा!
दिल-ए-नादाँ न धड़क ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क, कोई ख़त ले के पड़ोसी के घर आया होगा| कैफ़ भोपाली
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दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा!
कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा, मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा| कैफ़ भोपाली
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अच्छा लगा!
श्री रामदरश मिश्र जी ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपना योगदान किया है| उनकी कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज उनकी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो सामान्य ग़ज़लों से काफी लंबी है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल– आज धरती पर झुका आकाश…
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लोग कुछ डूबते नजर आए!
जब भी आंखों में अश्क भर आए लोग कुछ डूबते नजर आएचांद जितने भी गुम हुए शब के सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए| गुलज़ार
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आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ!
चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में, थोड़ा सा आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ| गुलज़ार