Category: Uncategorized
-
अगर याद भी न आऊँ उसे!
जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’, अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे| अहमद फ़राज़
-
वही जो राहत-ए-जाँ!
वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ, तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे| अहमद फ़राज़
-
अब कहाँ से लाऊँ उसे!
ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के, मैं कैसे बात करूँ अब कहाँ से लाऊँ उसे| अहमद फ़राज़
-
ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद!
वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद, मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे| अहमद फ़राज़
-
झील का ठहरा हुआ जल!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| तिवारी जी के अनेक नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं और उनको अनेक सम्मान भी प्राप्त हुए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत यह – उंगलियों से कभीहल्का-सा छुएँ भी तोझील का…
-
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है!
आग का क्या है पल दो पल में लगती है, बुझते बुझते एक ज़माना लगता है| कैफ़ भोपाली
-
सीधा दिल पे निशाना लगता है!
तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं, सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है| कैफ़ भोपाली
-
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है!
तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है, तेरे आगे चाँद पुराना लगता है| कैफ़ भोपाली
-
बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा!
‘कैफ़’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ, अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा| कैफ़ भोपाली