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वक्त!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी अत्यंत श्रेष्ठ और सृजनशील कवि एवं नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, इस नवगीत में श्री बुदधिनाथ मिश्र जी ने समय की असीम शक्ति का वर्णन किया है| लीजिए प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत – वक्त कभी माटी…
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जीने का शुऊ’र आ जाता है!
जब तुम से मोहब्बत की हम ने तब जा के कहीं ये राज़ खुला, मरने का सलीक़ा आते ही जीने का शुऊ’र आ जाता है| साहिर लुधियानवी
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तुम जब भी मुक़ाबिल होते हो!
हम पास से तुम को क्या देखें तुम जब भी मुक़ाबिल होते हो, बेताब निगाहों के आगे पर्दा सा ज़रूर आ जाता है| साहिर लुधियानवी
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हर चीज़ पे नूर आ जाता है!
तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं, महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर आ जाता है| साहिर लुधियानवी
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अपने पे ग़ुरूर आ जाता है!
चेहरे पे ख़ुशी छा जाती है आँखों में सुरूर आ जाता है, जब तुम मुझे अपना कहते हो अपने पे ग़ुरूर आ जाता है| साहिर लुधियानवी
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उस मक़ाम पे लाता चला गया!
ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ, मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया| साहिर लुधियानवी