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अपने पे ग़ुरूर आ जाता है!
चेहरे पे ख़ुशी छा जाती है आँखों में सुरूर आ जाता है, जब तुम मुझे अपना कहते हो अपने पे ग़ुरूर आ जाता है| साहिर लुधियानवी
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उस मक़ाम पे लाता चला गया!
ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ, मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया| साहिर लुधियानवी
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उसी को मुक़द्दर समझ लिया!
जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया, जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया| साहिर लुधियानवी
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कोट!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के अत्यंत श्रेष्ठ और सृजनशील कवि स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, इस कविता में सर्वेश्वर जी ने एक कोट के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति की है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता – खूँटी पर…
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जान से जाए पर इल्तिजा न करे!
ज़माना देख चुका है परख चुका है इसे, ‘क़तील’ जान से जाए पर इल्तिजा न करे| क़तील शिफ़ाई
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नसीबों ने मेरे प्यार का चाँद!
बुझा दिया है नसीबों ने मेरे प्यार का चाँद। , कोई दिया मिरी पलकों पे अब जला न करे| क़तील शिफ़ाई
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वफ़ा पे भरोसा रहे न दुनिया को!
अगर वफ़ा पे भरोसा रहे न दुनिया को, तो कोई शख़्स मोहब्बत का हौसला न करे| क़तील शिफ़ाई
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उसको मोहब्बत दुआएँ देती है!
सुना है उसको मोहब्बत दुआएँ देती है, जो दिल पे चोट तो खाए मगर गिला न करे| क़तील शिफ़ाई