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ये ज़रूरतों का सलाम है!
कहाँ अब दुआओं की बरकतें वो नसीहतें वो हिदायतें, ये मुतालबों का ख़ुलूस है ये ज़रूरतों का सलाम है| बशीर बद्र
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ये शराफ़तें नहीं बे-ग़रज़!
यूँही रोज़ मिलने की आरज़ू बड़ी रख-रखाव की गुफ़्तुगू ,ये शराफ़तें नहीं बे-ग़रज़ इसे आप से कोई काम है| बशीर बद्र
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कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है!
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है, कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है| बशीर बद्र
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यहीं रहती थी वह- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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उड़ रही है लुटी महफ़िलों की धूल!
आँखों में उड़ रही है लुटी महफ़िलों की धूल, इबरत-सरा-ए-दहर है और हम हैं दोस्तो| मुनीर नियाज़ी
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पिछ्ला पहर है और हम हैं दोस्तो!
शाम-ए-अलम ढली तो चली दर्द की हवा, रातों की पिछ्ला पहर है और हम हैं दोस्तो| मुनीर नियाज़ी
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आवारगी की लहर है!
फिरते हैं मिस्ल-ए-मौज-ए-हुआ शहर शहर में, आवारगी की लहर है और हम हैं दोस्तो| मुनीर नियाज़ी
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रुत का क़हर है और हम हैं दोस्तो!
लाई है अब उड़ा के गए मौसमों की बास, बरखा की रुत का क़हर है और हम हैं दोस्तो| मुनीर नियाज़ी
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ज़हर है और हम हैं दोस्तो!
ये अजनबी सी मंज़िलें और रफ़्तगाँ की याद, तन्हाइयों का ज़हर है और हम हैं दोस्तो| मुनीर नियाज़ी