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समुंदर की ज़िम्मेदारी है!
मैं क़तरा हो के भी तूफ़ाँ से जंग लेता हूँ, मुझे बचाना समुंदर की ज़िम्मेदारी है| वसीम बरेलवी
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चाँदनी चुप-चाप!
आज अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चाँदनी रात को लेकर अज्ञेय जी की यह अपनी ही प्रकार की अभिव्यक्ति है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की यह कविता – चाँदनी चुप-चाप सारी रातसूने आँगन मेंजाल रचती रही।मेरी रूपहीन अभिलाषाअधूरेपन की मद्धिमआँच पर तँचती रही।व्यथा मेरी अनकहीआनन्द की…
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इसका नया इलाज भी हो!
बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में, मरज़ पुराना है इसका नया इलाज भी हो| निदा फ़ाज़ली