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याद है तेरी हर सुब्ह-ए-रुख़्सत!
मुझे याद है तेरी हर सुब्ह-ए-रुख़्सत, मुझे याद हैं तेरे आने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी
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फुवारें सी नग़्मों की पड़ती हों जैसे!
फुवारें सी नग़्मों की पड़ती हों जैसे, कुछ उस लब के सुनने-सुनाने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी
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गुल-ए-ज़ार के वो खिलाने की रातें!
जवानी की दोशीज़गी का तबस्सुम, गुल-ए-ज़ार के वो खिलाने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी
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इक शख़्स के याद आने की रातें!
वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें, वो इक शख़्स के याद आने की रातें| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ख़लीफ़ा की खोपड़ी!
एक बार फिर मैं प्रमुख हास्य व्यंग्य कवि और श्रेष्ठ मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक हास्य-व्यंग्य कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – दर्शकों का नया जत्था आयागाइड ने उत्साह से…