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कोई ख़्वाब हसीं ढूँढना था!
नींद को ढूँड के लाने की दवाएँ थीं बहुत, काम मुश्किल तो कोई ख़्वाब हसीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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खोना था कहीं और कहीं ढूँढना था!
जुस्तुजू का इक अजब सिलसिला ता-उम्र रहा, ख़ुद को खोना था कहीं और कहीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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ढूँढ़ते फिरते थे उसे बन के हुजूम!
सब के सब ढूँडते फिरते थे उसे बन के हुजूम, जिसको अपने में कहीं अपने तईं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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अच्छा सा मकीं ढूँढना था!
पहले तामीर हमें करना था अच्छा सा मकाँ, फिर मकाँ के लिए अच्छा सा मकीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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जंगल में यक़ीं ढूँढना था!
जो कहीं था ही नहीं उसको कहीं ढूँढना था, हमको इक वहम के जंगल में यक़ीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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जीवन लय!
आज मैं हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी ने नवगीत आंदोलन का कुशल नेतृत्व किया तथा नवगीत संबंधी की संकलनों का संपादन भी किया था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का यह नवगीत – शब्द है,स्वर है,सजग अनुभूति…
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हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में!
नंगी सड़कों पर भटक कर देख जब मरती है रात, रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में| कैफ़ी आज़मी
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पथराव से घबराना तेरे शहर में!
जुर्म है तेरी गली से सर झुका कर लौटना, कुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में| कैफ़ी आज़मी
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देखा गया दीवाना तेरे शहर में!
आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ, आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में| कैफ़ी आज़मी