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टूटते कगार से!
आज एक बार फिर से मैं, अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – चाँदनी रात हुई जब झील झाँकने लगी अनमनी प्रीत गीत के…
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प्यार भी दरिया है उतर जाएगा!
आख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी, तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जाएगा| परवीन शाकिर
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इक ज़ख़्म है भर जाएगा!
हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा, क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा| परवीन शाकिर
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ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा!
वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा, मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा| परवीन शाकिर
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अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की!
अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है, जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की| परवीन शाकिर
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जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा!
उसने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा, रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की| परवीन शाकिर
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क़यामत शब-ए-तन्हाई की!
तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे, तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की| परवीन शाकिर
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यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की!
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया, बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की| परवीन शाकिर
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मगर बात है रुस्वाई की!
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उसने, बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की| परवीन शाकिर