Category: Uncategorized
-
मुझसे बिछड़ कर तिरी आँखें!
फिर कौन भला दाद-ए-तबस्सुम उन्हें देगा, रोएँगी बहुत मुझसे बिछड़ कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
समुंदर तिरी आँखें!
भड़काएँ मिरी प्यास को अक्सर तिरी आँखें, सहरा मिरा चेहरा है समुंदर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
ऋतुराज इक पल का!
आज एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि, वरिष्ठ गीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आज का यह नवगीत भी कुछ अलग किस्म का है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – राजमिस्त्री से…
-
इश्क़ को आज़मा के देख लिया!
‘फ़ैज़’ तकमील-ए-ग़म भी हो न सकी, इश्क़ को आज़मा के देख लिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
बहुत कुछ जला के देख लिया!
राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया, दिल बहुत कुछ जला के देख लिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
महरम अगर नहीं कोई!
दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई, तो ‘फ़ैज़’ ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू ही सही| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
बे-वुज़ू ही सही!
न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में, नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वुज़ू ही सही| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़