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दिन ढले यूँ तिरी!
सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें,दिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमें| शहरयार
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सुंदर कांड-अंतिम भाग
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं मुकेश जी द्वारा गाए गए सुंदर कांड के अंतिम भाग का कुछ अंश अपने स्वर मे प्रस्तुत कर रहा हूँ- विनय न मानहि जलधि जड़, गए तीन दिन बीत आशा है आपको यह पसंद आएगाधन्यवाद । ******
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ये ज़मीं चाँद से!
ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें,ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें| शहरयार
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ख़ौफ़ में डूबे हुए !
ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही,मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है| मुनव्वर राना
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दिल्ली! (कविता)
आज मैं हिंदी के अत्यंत श्रेष्ठ कवि तथा राष्ट्रकवि के रूप में सम्मान पाने वाले स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक अलग किस्म की रचना शेयर कर रहा हूँ। दिनकर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता –…
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मुस्तक़िल ज़ख़्म का!
मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन, मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है| मुनव्वर राना
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देखा हुआ होता है!
सारी दुनिया का सफ़र ख़्वाब में कर डाला है,कोई मंज़र हो मिरा देखा हुआ होता है| मुनव्वर राना