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मैं तो था लाचार!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत– मैं तो था लाचार,प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?देखा चारों ओर तुम्हारेवरदानों…
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उसी बाज़ार से हैं!
रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं, हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं| गुलज़ार
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वक़्त के तीर तो !
वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने,और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं| गुलज़ार
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तुम्हारे खत में !
दाग देहलवी जी की लिखी ग़ज़ल जिसे ग़ुलाम अली जी ने गाया है उसके सिर्फ दो शेर अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- तुम्हारे खत में नया एक सलाम किसका था! आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। ******
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चढ़ते सैलाब में!
चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया,लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं| गुलज़ार
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नाख़ुदा देख रहा है !
नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूँ,और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं| गुलज़ार
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जिनके हिरदय श्रीराम बसे!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में मुकेश जी का गाया यह प्रसिद्ध भजन प्रस्तुत कर रहा हूँ- जिनके हिरदय श्रीराम बसे, उन और का नाम लियो न लियो आशा है आपको पसंद आएगा,धन्यवाद। ********
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शाम से तेज़ हवा!
पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं,शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं| गुलज़ार
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हाथों का उठना!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। प्रभाकर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत– हाथों का उठनाकँपनागिर जानाकितने दिन चलेगा ? कितने दिन और सहेंगेवे कब चीत्कार करेंगेकब…