Category: Uncategorized
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लहू में जज़्ब हो सका!
लहू में जज़्ब हो सका न इल्म तो ये हाल है,कोई सवाल ज़ेहन को जो दे जला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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अब सिला नहीं रहा!
बदल गई है ज़िंदगी बदल गए हैं लोग भी,ख़ुलूस का जो था कभी वो अब सिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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जब यह दीप थके!
आज मैं छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। महादेवी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का यह गीत – जब यह दीप थके तब आना। यह चंचल सपने भोले है,दृग-जल पर पाले…
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पलक पे अब कोई
ख़ज़ाना तुम न पाए तो ग़रीब जैसे हो गए, पलक पे अब कोई भी मोती झिलमिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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फूल शाख़ पर तो है!
न हिज्र है न वस्ल है अब इस को कोई क्या कहे,कि फूल शाख़ पर तो है मगर खिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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कोई गिला नहीं रहा!
यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा,तो शुक्र कीजिए कि अब कोई गिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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अब आगे तेरी ख़ुशी है!
तिरे करम का सज़ा-वार तो नहीं ‘हसरत’,अब आगे तेरी ख़ुशी है जो सरफ़राज़ करे| हसरत मोहानी
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तिरी निगाह को !
उम्मीद-वार हैं हर सम्त आशिक़ों के गिरोह,तिरी निगाह को अल्लाह दिल-नवाज़ करे| हसरत मोहानी
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ग़म-ए-जहाँ से जिसे !
ग़म-ए-जहाँ से जिसे हो फ़राग़ की ख़्वाहिश,वो उन के दर्द-ए-मोहब्बत से साज़-बाज़ करे| हसरत मोहानी
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रँग गई पग-पग धन्य धरा!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। निराला जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का यह नवगीत – रँग गई पग-पग धन्य धरा,—हुई जग जगमग मनोहरा…