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परंपरा!
आज मैं देश के श्रेष्ठ हिंदी कवि और राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति प्राप्त स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। दिनकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – परंपरा को अंधी लाठी से…
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ज़िंदगी ज़ुल्फ़ तिरी !
न तो दम लेती है तू और न हवा थमती है,ज़िंदगी ज़ुल्फ़ तिरी कोई सँवारे कैसे| जावेद अख़्तर
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अरमान सभी ख़ाक!
दिल बुझा जितने थे अरमान सभी ख़ाक हुए,राख में फिर ये चमकते हैं शरारे कैसे| जावेद अख़्तर
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पुकारे तो पुकारे कैसे!
हर तरफ़ शोर उसी नाम का है दुनिया में,कोई उस को जो पुकारे तो पुकारे कैसे| जावेद अख़्तर
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क्या जाने सितारे कैसे!
हाथ को हाथ नहीं सूझे वो तारीकी थी,आ गए हाथ में क्या जाने सितारे कैसे| जावेद अख़्तर
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इन सराबों पे कोई!
हम ने ढूँडें भी तो ढूँडें हैं सहारे कैसे,इन सराबों पे कोई उम्र गुज़ारे कैसे| जावेद अख़्तर
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लहू में जज़्ब हो सका!
लहू में जज़्ब हो सका न इल्म तो ये हाल है,कोई सवाल ज़ेहन को जो दे जला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
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अब सिला नहीं रहा!
बदल गई है ज़िंदगी बदल गए हैं लोग भी,ख़ुलूस का जो था कभी वो अब सिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर