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जब-जब सिर उठाया!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। सर्वेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता – जब-जब सिर उठायाअपनी चौखट से टकराया।मस्तक पर लगी चोट,मन में उठी कचोट, अपनी ही भूल…
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अब तो ये बात हुई!
यूँ तो पहले भी कई दोस्त दग़ा देते थे,अब तो ये बात हुई ‘आम ख़ुदा ख़ैर करे| बाल स्वरुप राही
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उलट दी है नक़ाब!
जाने क्या सोच के उस बुत ने उलट दी है नक़ाब,और फिर वो भी सर-ए-बाम ख़ुदा ख़ैर करे| बाल स्वरुप राही
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आज-कल है वहाँ!
लाखों तूफ़ान कि जिस दिल में बसे रहते थे,आज-कल है वहाँ आराम ख़ुदा ख़ैर करे| बाल स्वरुप राही
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दर्द ने आ पकड़ा है!
फिर रँगे-हाथ मुझे दर्द ने आ पकड़ा है,फिर मोहब्बत का है इल्ज़ाम ख़ुदा ख़ैर करे| बाल स्वरुप राही
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है ये अफ़्वाह बड़े ज़ोर!
है ये अफ़्वाह बड़े ज़ोर पे हर महफ़िल में,उन को मुझ से है कोई काम ख़ुदा ख़ैर करे| बाल स्वरुप राही
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वो मुझ पे मेहरबान हैं!
लोग कहते हैं कि वो मुझ पे मेहरबान हैं फिर,उन के होंटों पे मिरा नाम ख़ुदा ख़ैर करे| बाल स्वरुप राही