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ऐ ‘नक़्श’ सहारों ने भी !
ये दौर-ए-मोहब्बत भी अजब दौर है इस में,ऐ ‘नक़्श’ सहारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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कलम का गीत!
आज मैं हिंदी नवगीत विधा के अनूठे कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – क़लम में आग है तो ज़िन्दगी है ।क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है…
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इक उम्र के यारों ने!
अग़्यार का शिकवा नहीं इस अहद-ए-हवस में, इक उम्र के यारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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चुप रह के बहारों ने!
माना कि थी ग़मगीन कली ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ से,चुप रह के बहारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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मदहोश इशारों ने भी!
किस तरह करें तुझ से गिला तेरे सितम का,मदहोश इशारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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इस डूबते सूरज से तो!
इस डूबते सूरज से तो उम्मीद ही क्या थी,हँस हँस के सितारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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ख़ामोश किनारों ने भी!
तूफ़ान का शेवा तो है कश्ती को डुबोना,ख़ामोश किनारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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पुर-कैफ़ बहारों ने भी!
पुर-कैफ़ बहारों ने भी दिल तोड़ दिया है,हाँ उन के नज़ारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श
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बन गई नक़्श जो!
बन गई नक़्श जो सुर्ख़ी तिरे अफ़्साने की,वो शफ़क़ है कि धनक है कि हिना है क्या है| नक़्श लायलपुरी
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वो बशर है कि!
दिल ख़तावार-ए-नज़र पारसा तस्वीर-ए-अना,वो बशर है कि फ़रिश्ता है ख़ुदा है क्या है| नक़्श लायलपुरी