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इमदाद नहीं करते!
साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर,अफ़सोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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हम याद नहीं करते!
दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते,याद आते हो तुम ख़ुद ही हम याद नहीं करते| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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जहाँ से किनारा करो!
काम आए न मुश्किल में कोई यहाँ मतलबी दोस्त हैं मतलबी यार हैं,इस जहाँ में नहीं कोई अहल-ए-वफ़ा ऐ ‘फ़ना’ इस जहाँ से किनारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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जिंदगी अपनी नहीं रही!
आज मैं हिंदी नवगीत के श्रेष्ठ कवि तथा मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुंवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। बेचैन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंवर बेचैन जी का यह नवगीत – दिवस खरीदे मजदूरी नेमजबूरी ने रातशाम हुई नीलाम…
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दिलबर इशारा करो!
दिल तो क्या चीज़ है जान से जाएँगे मौत आने से पहले ही मर जाएँगे,ये अदा देखने वाले लुट जाएँगे यूँ न हँस हँस के दिलबर इशारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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सदक़ा उतारा करो!
ये तबस्सुम ये आरिज़ ये रौशन जबीं ये अदा ये निगाहें ये ज़ुल्फ़ें हसीं,आइने की नज़र लग न जाए कहीं जान-ए-जाँ अपना सदक़ा उतारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी!
ऐसा बनना सँवरना मुबारक तुम्हें कम से कम इतना कहना हमारा करो,चाँद शरमाएगा चाँदनी रात में यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी सँवारा करो| फ़ना निज़ामी कानपुरी
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ऐ ‘नक़्श’ सहारों ने भी !
ये दौर-ए-मोहब्बत भी अजब दौर है इस में,ऐ ‘नक़्श’ सहारों ने भी दिल तोड़ दिया है| महेश चंद्र नक़्श