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आइना देखा करो!
तैश में आने लगे तुम तो मिरी तन्क़ीद पर, इस क़दर हस्सास हो तो आइना देखा करो| मंज़र भोपाली
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ईमान का सौदा करो!
रहनुमा ये दर्स हम को दे रहे हैं आज-कल,बेच दो सच्चाइयाँ ईमान का सौदा करो| मंज़र भोपाली
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हादसों का ख़ौफ़ ले!
ज़िंदगी के नाम-लेवा मौत से डरते नहीं,हादसों का ख़ौफ़ ले कर घर से मत निकला करो| मंज़र भोपाली
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फूल कहते हैं तुम्हें!
ख़ुद को पोशीदा न रक्खो बंद कलियों की तरह,फूल कहते हैं तुम्हें सब लोग तो महका करो| मंज़र भोपाली
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ख़ून से उजला करो!
दुख अँधेरों का अगर मिटता नहीं है ज़ेहन से,रात के दामन को अपने ख़ून से उजला करो| मंज़र भोपाली
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ख़्वाब मत देखा करो!
ज़िंदगी जीने का पहले हौसला पैदा करो, सिर्फ़ ऊँचे ख़ूबसूरत ख़्वाब मत देखा करो| मंज़र भोपाली
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दशहरे से दिवाली से!
वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअ’ल्लुक़ था,दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से| कैफ़ भोपाली
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क्यों आखिर क्यों?
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ संपादक एवं कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। नंदन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी का यह गीत – हो गई क्या हमसेकोई भूल?बहके-बहके लगने लगे फूल! अपनी समझ में…
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दिलासों से सहारों से!
ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं,उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से| कैफ़ भोपाली