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ये ख़याल अच्छा है!
आ गया उस का तसव्वुर तो पुकारा ये शौक़,दिल में जम जाए इलाही ये ख़याल अच्छा है| अमीर मीनाई
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देख ले बुलबुल ओ!
देख ले बुलबुल ओ परवाना की बेताबी को,हिज्र अच्छा न हसीनों का विसाल अच्छा है| अमीर मीनाई
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एक सवाल अच्छा है!
तुझ से माँगूँ मैं तुझी को कि सभी कुछ मिल जाए,सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है| अमीर मीनाई
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हम मरे जाते हैं!
अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है,हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है| अमीर मीनाई
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सत्य तो बहुत मिले!
आज मैं हिंदी साहित्य के विराट व्यक्तित्व स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता – खोज़ में जब निकल ही आयासत्य तो बहुत मिले ।…
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यूँही आ निकला था!
ये जगह हैरत-सराए है कहाँ थी ये ख़बर,यूँही आ निकला था मैं तो सैर करने के लिए| शहरयार
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रंग क्या कोई बचा है!
अब ज़मीं क्यूँ तेरे नक़्शे से नहीं हटती नज़र,रंग क्या कोई बचा है इस में भरने के लिए| शहरयार
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चाँद से जब भी कहा!
इस बुलंदी ख़ौफ़ से आज़ाद हो उस ने कहा,चाँद से जब भी कहा नीचे उतरने के लिए| शहरयार
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मैं ने सब तय्यारियाँ!
आसमाँ कुछ भी नहीं अब तेरे करने के लिए,मैं ने सब तय्यारियाँ कर ली हैं मरने के लिए| शहरयार