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किसी भी दर्द को !
अगर हद से गुज़र जाए दवा तो बन नहीं जाता,किसी भी दर्द को दुनिया का दरमाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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चराग़ाँ हम नहीं कहते!
तुम्हारे जश्न को जश्न-ए-फ़रोज़ाँ हम नहीं कहते,लहू की गर्म बूँदों को चराग़ाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
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तू न अब आए तो क्या!
तू न अब आए तो क्या आज तलक आती है,सीढ़ियों से तिरे क़दमों की सदा रात गए| जाँ निसार अख़्तर
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चाँद निकला भी तो!
आओ हम जिस्म की शम्ओं से उजाला कर लें,चाँद निकला भी तो निकलेगा ज़रा रात गए| जाँ निसार अख़्तर
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खोल देता है कोई!
चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुश्बू,खोल देता है कोई बंद-ए-क़बा रात गए| जाँ निसार अख़्तर
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तिलिस्मों की रिदा!
ये हक़ाएक़ की चटानों से तराशी दुनिया,ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा* रात गए|*चादर जाँ निसार अख़्तर
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वैभव के अमिट चरण-चिह्न!
आज मैं श्रेष्ठ राजनेता, हमारे पूर्व प्रधानमंत्री और कवि भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता – विजय का पर्व!जीवन संग्राम की काली घड़ियों मेंक्षणिक…
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गर्मी-ए-हुस्न में वो!
बर्क़ अगर गर्मी-ए-रफ़्तार में अच्छी है ‘अमीर‘, गर्मी-ए-हुस्न में वो बर्क़-जमाल अच्छा है| अमीर मीनाई
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आँखें दिखलाते हो!
आँखें दिखलाते हो जोबन तो दिखाओ साहब,वो अलग बाँध के रक्खा है जो माल अच्छा है| अमीर मीनाई