Category: Uncategorized
-
क़िस्मत की बात है!
मैं ने कहा की मिल के भी हम क्यूँ न मिल सके, कहने लगे हुज़ूर ये क़िस्मत की बात है| क़मर जलालाबादी
-
ये फ़ुर्सत की बात है!
मैं ने कहा कि आए हो कितने दिनों के बा’द,कहने लगे हुज़ूर ये फ़ुर्सत की बात है| क़मर जलालाबादी
-
हज़ारों साल बीते हैं!
हज़ारों साल बीते हैं हज़ारों साल बीतेंगे,बदल जाएगी कल तक़दीर-ए-इंसाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
-
गरेबाँ हम नहीं कहते!
बहारों से जुनूँ को हर तरह निस्बत सही लेकिन,शगुफ़्त-ए-गुल को आशिक़ का गरेबाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
-
हम नहीं कहते!
न बू-ए-गुल महकती है न शाख़-ए-गुल लचकती है,अभी अपने गुलिस्ताँ को गुलिस्ताँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
-
मगर इस ज़ुल्फ़ को!
किसी आशिक़ के शाने पर बिखर जाए तो क्या कहना,मगर इस ज़ुल्फ़ को ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
-
कोहरा!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री अश्वघोष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। अश्वघोष जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अश्वघोष जी का यह नवगीत – पता नहीं किस ज़ालिम डर सेउठा नहीं सूरज बिस्तर से । मुख पर हाथ धरे कोलाहल,ढूँढ़ रहा…
-
किसी भी हुस्न को!
नज़र की इंतिहा कोई न दिल की इंतिहा कोई,किसी भी हुस्न को हुस्न-ए-फ़रावाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर
-
किसी भी दर्द को !
अगर हद से गुज़र जाए दवा तो बन नहीं जाता,किसी भी दर्द को दुनिया का दरमाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर