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सज़ा गुनाहों की देना!
सज़ा गुनाहों की देना उस को ज़रूर लेकिन,वो आदमी है तुम उस की अज़्मत घटा न देना| क़तील शिफ़ाई
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तुम ऐसे पत्थर को!
वो जिस की ठोकर में हो सँभलने का दर्स शामिल,तुम ऐसे पत्थर को रास्ते से हटा न देना| क़तील शिफ़ाई
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ख़ुलूस को जो!
ख़ुलूस को जो ख़ुशामदों में शुमार कर लें,तुम ऐसे लोगों को तोहफ़तन भी वफ़ा न देना| क़तील शिफ़ाई
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वो सामने आए भी तो!
उसे मना कर ग़ुरूर उस का बढ़ा न देना,वो सामने आए भी तो उस को सदा न देना| क़तील शिफ़ाई
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कुहरा उठा!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। केदार नाथ सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। यह रचना अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल थी। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का यह नवगीत…
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किसे ख़बर है कि!
किसे ख़बर है कि कासा-ब-दस्त फिरते हैं,बहुत से लोग सरों पर हुमा के होते हुए| अहमद फ़राज़
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दिलरुबा के होते हुए!
‘फ़राज़’ ऐसे भी लम्हे कभी कभी आए,कि दिल-गिरफ़्ता रहे दिलरुबा के होते हुए| अहमद फ़राज़
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न चाहने पे भी!
न चाहने पे भी तुझ को ख़ुदा से माँग लिया,ये हाल है दिल-ए-बे-मुद्दआ के होते हुए| अहमद फ़राज़
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हवा के होते हुए!
वो हीला-गर हैं जो मजबूरियाँ शुमार करें,चराग़ हम ने जलाए हवा के होते हुए| अहमद फ़राज़