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सिलसिला ख़्वाबों का!
एक शब के टुकड़ों के नाम मुख़्तलिफ़ रखे,जिस्म-ओ-रूह का बंधन सिलसिला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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फ़ासला है ख़्वाबों का!
जागती हक़ीक़त तक रास्ता है ख़्वाबों का,दरमियाँ मिरे उन के फ़ासला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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कितना दुश्वार है!
जिस में कुछ क़ब्रें हों कुछ चेहरे हों कुछ यादें हों,कितना दुश्वार है उस शहर से हिजरत करना| लियाक़त जाफ़री
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अपनी शिकायत!
देख लेना बड़ी तस्कीन मिलेगी तुम को,ख़ुद से इक रोज़ कभी अपनी शिकायत करना| लियाक़त जाफ़री
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दिल की तख़्ती पे भी!
दिल की तख़्ती पे भी आयात लिखी रहती हैं,वक़्त मिल जाए तो उन की भी तिलावत करना| लियाक़त जाफ़री
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सुरमई आँख हसीं!
सुरमई आँख हसीं जिस्म गुलाबी चेहरा,इस को कहते हैं किताबत पे किताबत करना| लियाक़त जाफ़री
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बंधुआ मज़दूर!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। कैलाश वाजपेयी जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की यह कविता – अरे तू काहे को रोता हैयहाँ कुछ ख़त्म नहीं होता छूट रही नहीं कोई संपदा यों…
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मोहब्बत में सियासत!
जिस को तुम चाहो कोई और न चाहे उस को,इस को कहते हैं मोहब्बत में सियासत करना| लियाक़त जाफ़री
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दो बार मोहब्बत!
कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना,एक ही शख़्स से दो बार मोहब्बत करना| लियाक़त जाफ़री