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रूपांतर!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कथाकार एवं कवि स्वर्गीय गंगा प्रसाद विमल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। विमल जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गंगा प्रसाद विमल जी की यह कविता – रूपांतरइतिहासगाथाएंझूठ हैं सबसच है एक पेडजब तक वह फल देता है…
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दूर की सदा क्या है!
उदास रात की ख़ामोशियों में ऐ ‘क़ैसर‘, क़रीब आती हुई दूर की सदा क्या है| क़ैसर शमीम
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रहेगी धूप मिरे सर पे!
रहेगी धूप मिरे सर पे आख़िरी दिन तक,जवाँ है पेड़ मगर उस का आसरा क्या है| क़ैसर शमीम
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हर एक साँस की धार!
अभी तो काट रही है हर एक साँस की धार,अज़ल जब आए तो देखूँ कि इंतिहा क्या है| क़ैसर शमीम