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ख़ाली कई मकान पड़े!
किसी मकीन की आमद के इंतिज़ार में हैं,मिरे मोहल्ले में ख़ाली कई मकान पड़े| राहत इंदौरी
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उठे हैं हाथ मिरे!
उठे हैं हाथ मिरे हुर्मत-ए-ज़मीं के लिए.मज़ा जब आए कि अब पाँव आसमान पड़े| राहत इंदौरी
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बीनाइयों पे रोते हैं!
हमारे शहर की बीनाइयों पे रोते हैं,तमाम शहर के मंज़र लहू-लुहान पड़े| राहत इंदौरी
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अनुरक्ति!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। दुष्यंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। दुष्यंत जी आपातकाल में लिखे गए ‘साये में धूप’ नामक अपने ग़ज़ल संग्रह से विशेष रूप से विख्यात हुए थे। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार…
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इशारा कर दें तो!
ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े, इशारा कर दें तो सूरज ज़मीं पे आन पड़े| राहत इंदौरी