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मैं चाहता हूँ कि!
मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे,मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर वो छोड़ दे!
ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है,अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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दर-ब-दर हो जाऊँ!
मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ,मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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तुम ने जो तोड़ दिए!
तुम ने जो तोड़ दिए ख़्वाब हम उन के बदले,कोई क़ीमत कभी लेते तो ख़ुदाई लेते| राहत इंदौरी
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अँधेरों से कमाई लेते!
चाँद रातों में हमें डसता है दिन में सूरज,शर्म आती है अँधेरों से कमाई लेते| राहत इंदौरी
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हमदर्दों का ये दर्द!
कितना मानूस सा हमदर्दों का ये दर्द रहा,इश्क़ कुछ रोग नहीं था जो दवाई लेते| राहत इंदौरी
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पेड़!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय धनंजय वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धनंजय वर्मा जी की यह कविता – रास्ते का पेड़दुपहरिया में तपपत्तियों की ताल पेझुमक झूम झूमर गीत गाता है । राह का थकाहर मुसाफिरतने…
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बर्फ़ की तरह दिसम्बर
बर्फ़ की तरह दिसम्बर का सफ़र होता है, हम उसे साथ न लेते तो रज़ाई लेते| राहत इंदौरी