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कौवे-1
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री नरेश सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नरेश जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश सक्सेना जी की यह कविता – हमारे शहर के कौवे केंचुए खाते हैंआपके शहर के क्या खाते हैं कोई थाली नहीं…
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जन्नत पुकारती है!
जन्नत पुकारती है कि मैं हूँ तिरे लिए, दुनिया ब-ज़िद है मुझ से कि जन्नत करो मुझे| मुनव्वर राना
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पानी ने कब कहा था!
मैं ने तो तुम से की ही नहीं कोई आरज़ू,पानी ने कब कहा था कि शर्बत करो मुझे| मुनव्वर राना
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मिट्टी की सूरत करो!
फिर से बदल के मिट्टी की सूरत करो मुझे,इज़्ज़त के साथ दुनिया से रुख़्सत करो मुझे| मुनव्वर राना
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सुनो हवाओ अगर मैं!
बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना,सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मुझे तू ढाल दे ऐसे!
मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में,मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो’तबर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर मैं छू लूँ !
बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में,अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं अपने झुण्ड से!
मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा, मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ| मुनव्वर राना