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फिर अपने साथ उसे!
फिर उठ के गर्म करें कारोबार-ए-ज़ुल्फ़-ओ-जुनूँ, फिर अपने साथ उसे भी असीर-ए-दाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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ग़ुलाम रह चुके!
ग़ुलाम रह चुके तोड़ें ये बंद-ए-रुस्वाई,कुछ अपने बाज़ू-ए-मेहनत का एहतिराम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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सखि, वे मुझसे कहकर जाते!
आज मैं हिंदी साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय मैथिली शरण गुप्त जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ। यह कविता लक्ष्मण जी की पत्नी सुमित्रा से संबंधित है, जिनको वे बिना सूचित किए वन में चले गए थे। गुप्त जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत…
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न माँगूँ बादा-ए-गुल!
न माँगूँ बादा-ए-गुल-गूँ से भीक मस्ती की,अगर तिरे लब-ए-लालीं मिरा ये काम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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थी आरज़ू कि तिरे!
ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना,थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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ये जीने का एहतिमाम!
अब अहल-ए-दर्द ये जीने का एहतिमाम करें,उसे भुला के ग़म-ए-ज़िंदगी का नाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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क़ाफ़िले की मिरे!
‘मजरूह’ क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है,रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
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किस ने कहा कि टूट!
किस ने कहा कि टूट गया ख़ंजर-ए-फ़रंग,सीने पे ज़ख़्म-ए-नौ भी है दाग़-ए-कुहन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
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नए पैरहन के साथ!
दुश्मन की दोस्ती है अब अहल-ए-वतन के साथ,है अब ख़िज़ाँ चमन में नए पैरहन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी