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मैं रहा हूँ परिचित, रात से!
आज एक बार फिर मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। (अनुवाद हेतु मूल रचनाएं मैं सामान्यतः ‘Poemhunter.com’ से लेता हूँ।) पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद- मैं रहा हूँ – परिचित रात से।मैं बरसात में निकला…
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पहाड़ पेड़ नदी !
पहाड़ पेड़ नदी साथ दे रहे हैं मिरा,ये तेरी ओर मिरा आख़िरी सफ़र तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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कि तेरे पाँव के नीचे!
बुलंद होते हुए देख ले ज़मीं की तरफ़,कि तेरे पाँव के नीचे किसी का सर तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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मैं इस ज़मीं का!
पलटने वाले परिंदों पे बद-हवासी है,मैं इस ज़मीं का कहीं आख़िरी शजर तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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दश्त मेरा घर तो नहीं!
मिरे दिमाग़ पे आसेब का असर तो नहीं,गुमाँ गुज़रता है ये दश्त मेरा घर तो नहीं। क़मर अब्बास क़मर
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कंगन दिलाने के लिए!
मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में,अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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संजीदा बनाने के लिए!
देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना,तजरबे आए थे संजीदा बनाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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छत टपकती थी!
छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद,मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी
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मैंने अपने गानों को जन्म दिया!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार एवं कवि स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले ही शेयर की है। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – मैंने अपने गानों को जन्म दियाएकदम चुपचाप-अकेले,पर फिर भी एक दिनउन सबके कण्ठ खुले,और…
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आसमाँ ऐसा भी क्या!
आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से,इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी