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नहीं है कोई भी!
सज़ाएँ मेरी तरह हँस के झेलने वाला,नहीं है कोई भी अहद-ए-सज़ा के बंदों में| क़ैसर शमीम
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लौटना!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विष्णु खरे जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। विष्णु जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विष्णु खरे जी की यह कविता – उसे जहाँ छोड़ा थाकभी-कभी वहाँ जाकर खड़ा हो जाता हूँकूडे़ के जिस अम्बार को देखवह…
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कहाँ है बू-ए-वफ़ा !
वो कौन है जो नहीं अपनी मस्लहत* का ग़ुलाम,कहाँ है बू-ए-वफ़ा अब वफ़ा के बंदों में|*Problems क़ैसर शमीम
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है इंतिशार का आलम!
न कोई सम्त मुक़र्रर न कोई जा-ए-क़रार,है इंतिशार* का आलम हवा के बंदों में| *घबराहट क़ैसर शमीम
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घिरा हुआ हूँ अभी!
कहाँ है कोई ख़ुदा का ख़ुदा के बंदों में,घिरा हुआ हूँ अभी तक अना के बंदों में| क़ैसर शमीम
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दूर की सदा क्या है!
उदास रात की ख़ामोशियों में ऐ ‘क़ैसर’,क़रीब आती हुई दूर की सदा क्या है| क़ैसर शमीम
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जवाँ है पेड़ मगर!
रहेगी धूप मिरे सर पे आख़िरी दिन तक,जवाँ है पेड़ मगर उस का आसरा क्या है| क़ैसर शमीम
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देखूँ कि इंतिहा क्या है!
अभी तो काट रही है हर एक साँस की धारअज़ल जब आए तो देखूँ कि इंतिहा क्या है क़ैसर शमीम