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ये चली है कैसी हवा!
ये चली है कैसी हवा कि अब नहीं खिलते फूल मिलाप के,कभी दौर-ए-फ़स्ल-ए-बहार था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी
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याद हो कि न याद हो!
कभी हम में तुम में भी प्यार था तुम्हें याद हो कि न याद हो,न किसी के दिल में ग़ुबार था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी
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शब्द बच्चों की तरह!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री लीलाधर मंडलोई जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। मंडलोई जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री लीलाधर मंडलोई जी की यह कविता – मेरे भीतर कोमल शब्दों की एक डायरी होगी जरूरमेरी कविता में स्त्रियां बहुत हैंमेरा मन स्त्री…
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मैं मुराद-ए-शौक़ को!
मैं मुराद-ए-शौक़ को पा के भी न मुराद-ए-शौक़ को पा सकूँ,दर-ए-मेहरबाँ पे पहुँच के भी दर-ए-मेहरबाँ से गुज़र गया| अर्श मलसियानी
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लोग कहते हैं ज़िंदगी!
जिसे लोग कहते हैं ज़िंदगी वो तो हादसों का हुजूम है, वो तो कहिए मेरा ही काम था कि मैं दरमियाँ से गुज़र गया| अर्श मलसियानी
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तूने रोका जहाँ जहाँ!
View Post ये मिरा कमाल-ए-गुनह सही मगर इस को देख मिरे ख़ुदा,मुझे तू ने रोका जहाँ जहाँ मैं वहाँ वहाँ से गुज़र गया| अर्श मलसियानी
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अभी आदमी है!
अभी आदमी है फ़ज़ाओं में अभी उड़ रहा है ख़लाओं में,ये न जाने पहुँचेगा किस जगह अगर आसमाँ से गुज़र गया| अर्श मलसियानी
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कहाँ से गुज़र गया!
कभी मेहर-ओ-माह-ओ-नुजूम से कभी कहकशाँ से गुज़र गया,जो तेरे ख़याल में चल पड़ा वो कहाँ कहाँ से गुज़र गया| अर्श मलसियानी
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आस्ताँ से गुज़र गया!
कभी इस मकाँ से गुज़र गया कभी उस मकाँ से गुज़र गया,तिरे आस्ताँ की तलाश में मैं हर आस्ताँ से गुज़र गया| अर्श मलसियानी