Category: Uncategorized
-
इन आँसुओं का कोई!
इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए,कि हम भी ‘मीर’ का दीवान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
-
बुझे बुझे से कुछ!
चराग़-ए-क़ुर्ब से कर दीजिए उन्हें रौशन,बुझे बुझे से कुछ अरमान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
-
तेरे शहर से हो कर!
तेरे शहर से हो कर आई तेज़ हवा,फिर दिल की बुनियाद हिला कर बैठ गई| इरशाद ख़ान सिकंदर
-
फालतू चीज़!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री विष्णु नागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नागर जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विष्णु नागर जी की यह कविता – घर में कोई चीज़फालतू नहीं थीटूटा कंघा लगता थाअमर हैभरोसा था अब खोएगा भी नहीं…
-
अब के चराग़ों ने!
अब के चराग़ों ने चौंकाया दुनिया को,आँधी आख़िर में झुँझला कर बैठ गई| इरशाद ख़ान सिकंदर
-
गुड़ियों का अम्बार!
बूढ़ी माँ का शायद लौट आया बचपन,गुड़ियों का अम्बार लगा कर बैठ गई| इरशाद ख़ान सिकंदर