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काग़ज़ पे घरौंदा!
सुन लिया होगा हवाओं में बिखर जाता है,इस लिए बच्चे ने काग़ज़ पे घरौंदा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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रात की पलकों पे!
दिन के माथे पे तो सूरज ही लिखा था तू ने, रात की पलकों पे किस ने ये अँधेरा लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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उसने कहाँ का!
शहर भी लिक्खा मकाँ लिक्खा मोहल्ला लिखा,हम कहाँ के थे मगर उस ने कहाँ का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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जंगल कभी सहरा!
कभी जंगल कभी सहरा कभी दरिया लिख्खा,अब कहाँ याद कि हम ने तुझे क्या क्या लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम
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ज़रा सी कम तो हुई है!
उजाला तो नहीं कह सकते इस को हम लेकिन,ज़रा सी कम तो हुई है ये तीरगी देखो| जावेद अख़्तर