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कहीं ऐसा न हो!
नज़र-अंदाज़ कर मुझ को ज़रा सा खुल के जीने दे,कहीं ऐसा न हो तेरी निगहबानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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वीराने से मर जाऊँ!
ग़नीमत है परिंदे मेरी तन्हाई समझते हैं,अगर ये भी न हों तो घर के वीराने से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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आसानी से मर जाऊँ!
मैं इतना सख़्त-जाँ हूँ दम बड़ी मुश्किल से निकलेगा,ज़रा तकलीफ़ बढ़ जाए तो आसानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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हैरानी से मर जाऊँ!
तुम उस को देख कर छू कर भी ज़िंदा लौट आए हो,मैं उस को ख़्वाब में देखूँ तो हैरानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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मैं पानी से मर जाऊँ!
लब-ए-साहिल समुंदर की फ़रावानी से मर जाऊँ,मुझे वो प्यास है शायद कि मैं पानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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न जाने किधर गया वो!
वो रात का बे-नवा मुसाफ़िर वो तेरा शाइर वो तेरा ‘नासिर’,तिरी गली तक तो हम ने देखा था फिर न जाने किधर गया वो| नासिर काज़मी
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सर झुकाए गुज़र गया!
वो जिस के शाने पे हाथ रख कर सफ़र किया तू ने मंज़िलों का,तिरी गली से न जाने क्यूँ आज सर झुकाए गुज़र गया वो| नासिर काज़मी
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काल तुझसे होड़ है मेरी!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता – काल,तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू-तुझमें अपराजित मैं वास करूं ।इसीलिए तेरे हृदय…
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कल रात मर गया वो!
वो हिज्र की रात का सितारा वो हम-नफ़स हम-सुख़न हमारा, सदा रहे उस का नाम प्यारा सुना है कल रात मर गया वो| नासिर काज़मी