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सौ-सौ प्रतीक्षित पल गए!
आज एक बार फिर मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। गर्ग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का यह नवगीत- सौ-सौ प्रतीक्षित पल गएसारे भरोसे छल गएकिरणें हमारे गाँव मेंख़ुशियाँ नहीं लाईं…
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इक तीर सा दिल में!
क्या शय थी किसी की पहली नज़र कुछ इस के अलावा याद नहीं,इक तीर सा दिल में जैसे लगा पैवस्त हुआ और टूट गया। शमीम जयपुरी
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तार भी छेड़ा टूट गया!
सोचा था हरीम-ए-जानाँ में नग़्मा कोई हम भी छेड़ सकें,उम्मीद ने साज़-ए-दिल का मगर जो तार भी छेड़ा टूट गया। शमीम जयपुरी
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जब दिल को सुकूँ ही!
जब दिल को सुकूँ ही रास न हो फिर किस से गिला नाकामी का,हर बार किसी का हाथों में आया हुआ दामन छूट गया। शमीम जयपुरी
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दुनिया-ए-मोहब्बत!
दुनिया-ए-मोहब्बत में हम से हर अपना पराया छूट गया,अब क्या है जिस पर नाज़ करें इक दिल था वो भी टूट गया। शमीम जयपुरी
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बहुत से शे’र मुझ से!
बहुत से शे‘र मुझ से ख़ून थुकवाते हैं आमद पर, बहुत मुमकिन है मैं एक दिन ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी