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सुना है बच्चों में!
हमेशा मंदिर-ओ-मस्जिद में वो नहीं रहता,सुना है बच्चों में छुप कर वो खेलता भी है| निदा फ़ाज़ली
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वो ख़ुश-लिबास भी!
वो ख़ुश-लिबास भी ख़ुश-दिल भी ख़ुश-अदा भी है,मगर वो एक है क्यूँ उस से ये गिला भी है| निदा फ़ाज़ली
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सूख रहे धान!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री शिवबहादुर सिंह भदौरिया जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कविताएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शिवबहादुर सिंह भदौरिया जी की यह कविता – सूख रहे धान और पोखर का जल,चलो पिया गुहरायें बादल-बादल। रंग की नुमाइश इन्द्र नहीं लाये,नदी नहीं…
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चाँद में कैसे हुई क़ैद!
चाँद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी,ये कहानी किसी मस्जिद की अज़ाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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पानी पे लिखी तहरीरें!
कौन पढ़ सकता है पानी पे लिखी तहरीरें,किस ने क्या लिक्खा है ये आब-ए-रवाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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चाँद से फूल से या!
चाँद से फूल से या मेरी ज़बाँ से सुनिए,हर जगह आप का क़िस्सा है जहाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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कोई अजनबी तो नहीं!
तुम्हारी बज़्म में अफ़्साना कहते डरता हूँ,ये सोचता हूँ यहाँ कोई अजनबी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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ये ज़िंदगी तो नहीं!
ये हिज्र-ए-यार ये पाबंदियाँ इबादत की,किसी ख़ता की सज़ा है ये ज़िंदगी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर