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जो दर खुला है!
हमें तो सिर्फ़ जगाना है सोने वालों को,जो दर खुला है वहाँ हम सदा नहीं देंगे| राहत इंदौरी
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हों लाख ज़ुल्म मगर!
हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दु’आ नहीं देंगे,ज़मीन माँ है ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे| राहत इंदौरी
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अहसान तुम्हारा!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का एक अधूरा गीत शेयर कर रहा हूँ| निर्धन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का यह गीत – इतनी बड़ी भीड़ में केवल, था मेरा ही कण्ठ अकेलातुमने स्वर दे…