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मैं चाहता हूँ कि!
मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे,मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर वो छोड़ दे!
ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है,अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मुझे सँभाल ले!
इससे पहले कि मैं बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ,मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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सिसकियाँ उस की न !
सिसकियाँ उस की न देखी गईं मुझ से ‘रा’ना’,रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते| मुनव्वर राना
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वर्ना हम और तुझे!
इन सिसकते हुए रिश्तों के कहाँ थे क़ाइल,वर्ना हम और तुझे दाग़-ए-जुदाई देते| मुनव्वर राना
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बंदिशें रोने लगीं!
साथ रहने से भी खिल जाते हैं रिश्तों के कँवल,बंदिशें रोने लगीं मुझ को रिहाई देते| मुनव्वर राना
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घर में डरते थे!
कहीं बे-नूर न हो जाएँ वो बूढ़ी आँखें,घर में डरते थे ख़बर भी मिरे भाई देते| मुनव्वर राना
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कौन!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शलभ जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – कौन ले जा रहा है मनुष्य कोसामूहिक आत्मघात की दिशा में बिला झिझक?सभ्यता कोध्वंसावशेषों…
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सूने पनघट का!
सूने पनघट का कोई दर्द-भरा गीत थे हम, शहर के शोर में क्या तुझ को सुनाई देते| मुनव्वर राना
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बच्चे को मिठाई देते!
कुछ खिलौने कभी आँगन में दिखाई देते,काश हम भी किसी बच्चे को मिठाई देते| मुनव्वर राना