Category: Uncategorized
-
धूप सड़क की!
आज मैं श्रेष्ठ राजस्थानी एवं हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत – धूप सड़क की नहीं सहेली जब कोरे मेड़ी ही कोरेछत पसरी पसवाड़े फोरेछ्जवालों से…
-
रोना नसीब में है!
रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला,अपने ही सर लिया कोई इल्ज़ाम रो पड़े। सुदर्शन फ़ाकिर
-
दो गाम ही चले थे!
राह-ए-वफ़ा में हमको ख़ुशी की तलाश थी,दो गाम ही चले थे के हर गाम रो पड़े। सुदर्शन फ़ाकिर
-
अपनी वफ़ा का सोच!
उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े,अपनी वफ़ा का सोच के अंजाम रो पड़े। सुदर्शन फ़ाकिर
-
एक दो रोज़ का!
एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें “फ़ाकिर”,हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर
-
तुझसे मिलकर हमें!
तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था,तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर
-
रोनेवालों से कह दो!
रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलेंजिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर
-
आप कहते थे के!
आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब,उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर
-
वर्ना क्या बात थी!
इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया,वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया। सुदर्शन फ़ाकिर