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आरिज़ पे लहराते रहे!
जिस क़दर बढ़ता गया ज़ालिम हवाओं का ख़रोश,उस के काकुल और भी आरिज़ पे लहराते रहे| अली सरदार जाफ़री
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रहबरों की भूल थी!
रहबरों की भूल थी या रहबरी का मुद्दआ’,क़ाफ़िलों को मंज़िलों के पास भटकाते रहे| अली सरदार जाफ़री
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कारवान-ए-हिम्मत!
कारवान-ए-हिम्मत-ए-जम्हूर बढ़ता ही गया,शहरयार-ओ-हुक्मराँ आते रहे जाते रहे| अली सरदार जाफ़री
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अपना परचम हम भी!
आँधियाँ चलती रहें अफ़्लाक थर्राते रहे,अपना परचम हम भी तूफ़ानों में लहराते रहे| अली सरदार जाफ़री
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बाँझ हो जाएगी क्या!
राम-ओ-गौतम की ज़मीं हुर्मत-ए-इंसाँ की अमीं,बाँझ हो जाएगी क्या ख़ून की बरसात के बा’द| अली सरदार जाफ़री
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बच गया है जो लहू !
ऐ वतन ख़ाक-ए-वतन वो भी तुझे दे देंगे,बच गया है जो लहू अब के फ़सादात के बा’द| अली सरदार जाफ़री
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आए हम ‘ग़ालिब’-ओ!
आए हम ‘ग़ालिब’-ओ-‘इक़बाल’ के नग़्मात के बा’द,‘मुसहफ़’-ए-इश्क़-ओ-जुनूँ हुस्न की आयात के बा’द| अली सरदार जाफ़री
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यह धरती कितना देती है!
एक बार फिर से कविताएं शेयर करने का सिलसिला छायावाद युग से शुरू कर रहा हूँ। आज मैं प्रसिद्ध हिंदी कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| पंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता –…