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मिरी सज़ा कोई और है
वही मुंसिफ़ों की रिवायतें वही फ़ैसलों की इबारतें,मिरा जुर्म तो कोई और था प मिरी सज़ा कोई और है| सलीम कौसर
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वही है या कोई और है
मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर,तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है| सलीम कौसर
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जानता कोई और है!
अजब ए’तिबार ओ बे-ए’तिबारी के दरमियान है ज़िंदगी,मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है| सलीम कौसर
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माँगता कोई और है!
मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ,मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है| सलीम कौसर
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सोचता कोई और है!
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है,सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है| सलीम कौसर
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शून्य होकर!
एक बार फिर से आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता– शून्य होकरबैठ जाता है जैसेउदास बच्चा उस दिन उतना अकेलाऔर असहाय बैठा दिखाशाम…
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वो और हम से पूछे!
वो और हम से पूछे कि ‘बिल्क़ीस’ कुछ तो कह,कम-बख़्त हम कि होश ही अपने बजा न थे| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
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तेरे करम के हाथ!
क्यूँ सब्र-आश्ना न हुआ ना-मुराद दिल, तेरे करम के हाथ तो यूँ बे-अता न थे| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
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हरगिज़ गिला नहीं है !
हरगिज़ गिला नहीं है कि तू मेहरबाँ न था,कब हम भी अपने आप से बेहद ख़फ़ा न थे| बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन