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सोच को आदाब!
तुम ने समझाए मिरी सोच को आदाब अदब,लफ़्ज़ ओ मअनी से उलझना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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अच्छे शेरों की परख!
अच्छे शेरों की परख तुम ने ही सिखलाई मुझे,अपने अंदाज़ से कहना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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तुमसे हासिल हुआ!
तुम से हासिल हुआ इक गहरे समुंदर का सुकूत,और हर मौज से लड़ना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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नक़्श की तरह!
नक़्श की तरह उभरना भी तुम्ही से सीखा,रफ़्ता रफ़्ता नज़र आना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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आकाशदीप!
एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत– जलता रहता सारी रात एक आस मेंमेरे आँगन का आकाशदीप । पीले अक्षत…