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सैकड़ों मोती हैं!
ज़माने में नहीं अहल-ए-हुनर का क़द्र-दाँ बाक़ी,नहीं तो सैकड़ों मोती हैं इस दरिया के दामन में| चकबस्त बृज नारायण
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बहार आई है!
हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-बख़ुद बेचैन करती है,क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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तिरी क़ुदरत से वो!
गराँ थी धूप और शबनम भी जिन पौदों को गुलशन में,तिरी क़ुदरत से वो फूले-फले सहरा के दामन में| चकबस्त बृज नारायण
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शजर सकते में हैं!
शजर सकते में हैं ख़ामोश हैं बुलबुल नशेमन में,सिधारा क़ाफ़िला फूलों का सन्नाटा है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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सिलसिला हवस का!
इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी,इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं| चकबस्त बृज नारायण
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गुल हैं मगर !
अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं| *कटी हुई शाखा चकबस्त बृज नारायण
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मत कर यों बदनाम!
एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री बालस्वरूप राही जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत– मत कर यों बदनाम मुझे तू व्यर्थ सहेली बावरी,देखी तक भी नहीं आज…
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जो दाग़ आसमाँ के हैं!
हम सोचते हैं रात में तारों को देख करशमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं चकबस्त बृज नारायण
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पर बड़ी बात पे!
छोटी सी बात पे ख़ुश होना मुझे आता था,पर बड़ी बात पे चुप रहना तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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रिश्ता-ए-नाज़ को!
रिश्ता-ए-नाज़ को जाना भी तो तुम से जाना,जामा-ए-फ़ख़्र पहनना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह