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मोहब्बत से तुम्हें!
मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम,निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए| कैफ़ भोपाली
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मोहब्बत ज़हर है!
वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ,मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार* हो जाए| *Addiction कैफ़ भोपाली
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मिरा दीदार हो जाए!
ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की,मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए| कैफ़ भोपाली
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ज़माने से कहो कुछ!
ज़माने से कहो कुछ साइक़ा-रफ़्तार हो जाए,हमारे साथ चलने के लिए तय्यार हो जाए| कैफ़ भोपाली
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टूटा बाजूबन्द!
एक बार फिर से आज मैं, हिंदी नवगीत के अद्वितीय हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत– मौसमी प्यास चौगुनी हुईदेख दुविधा का चाँद अमन्दफ़सल के कटे खेत…
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तारों के ख़ज़ाने ढूँढे है!
क्या बात है तेरी बातों की लहजा है कि है जादू कोई, हर आन फ़ज़ा में दिल उड़ कर तारों के ख़ज़ाने ढूँढे है| ताज भोपाली
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आँखों में लिए शबनम
आँखों में लिए शबनम की चमक सीने में लिए दूरी की कसक,वो आज हमारे पास आ कर कुछ ज़ख़्म पुराने ढूँढे है| ताज भोपाली
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गीतों की फ़ज़ाएँ माँगे!
दिल तेरी नज़र की शह पा कर मिलने के बहाने ढूँढे है,गीतों की फ़ज़ाएँ माँगे है ग़ज़लों के ज़माने ढूँढे है| ताज भोपाली