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नदी कभी-2
कल एक गीत लिखा था, आज उसमें ही कुछ और छंद जोडे हैं, आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत है- नदी कभी नाला बन जाती है, नाला कभी नदी बन जाता है। कुदरत के बलिष्ठ सेनानी हैं वायु, मेघ, पर्वत, सूरज, तारे ये ही मंत्री, यही विधायक हैं दैवी शासन के ये रखवारे, इनका रुख बदला…
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याद बे-सदा तेरी!
एक दश्त-ए-ख़ामोशी अब मिरा मुक़द्दर है,याद बे-सदा तेरी ज़ख़्म बे-चमन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल
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दर्द बे-वतन मेरा!
दिल भी खो गया शायद शहर के सराबों में,अब मिरी तरह से है दर्द बे-वतन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल
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सब हुनर सजाए थे!
मैं ने अपने चेहरे पर सब हुनर सजाए थे,फ़ाश कर गया मुझ को सादा पैरहन मेरा| अब्दुल्लाह कमाल