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बिछड़ना है तो बिछड़ जा!
बिछड़ना है तो बिछड़ जा इसी दो-राहे पर,कि मोड़ आगे सफ़र में कहीं नहीं आता| शहरयार
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पांव हुए पत्थर के-2
कल एक नया गीत शेयर किया था, उसी शीर्षक से अपनी एक और नई रचना आज आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ- कूदे हम खूब कभी कविता की रस्सी,अब तो लगता जैसे पाँव हुए पत्थर के| वह छलांग पहले की कविता में, बाहर भीमित्रों की महफिल में औ घर के अंदर भी, बेफिक्री…
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जो होने वाला है!
जो होने वाला है अब उस की फ़िक्र क्या कीजे,जो हो चुका है उसी पर यक़ीं नहीं आता| शहरयार
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नज़र जो कोई भी!
नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता,किसी को क्या मुझे ख़ुद भी यक़ीं नहीं आता| शहरयार
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क़िस्सा-ए-दर्द में!
क़िस्सा-ए-दर्द में ये बात कहाँ से आई,मैं बहुत हँसता हूँ जब कोई सुनाता है मुझे| शहरयार
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कैसे मिलाता है मुझे!
तेरा मुंकिर नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है,बिछड़े लोगों से कहाँ कैसे मिलाता है मुझे| शहरयार
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ख़्वाबों से पशेमानी है!
मेरी इन आँखों को ख़्वाबों से पशेमानी है,नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे| शहरयार
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कौन बुलाता है मुझे!
रात का वक़्त है सूरज है मिरा राह-नुमा,देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे| शहरयार